सिंधिया के आने से मजबूत होगी भाजपा

Saras Salil - Hindi|April First 2020

सिंधिया के आने से मजबूत होगी भाजपा
मैं तो बहुतकुछ करना चाहता हूं, लेकिन फलाना मुझे करने ही नहीं देता', नौकरी और कारोबार से ले कर निजी जिंदगी में ऐसी बातें हर कोई कहता नजर आ जाएगा, फिर राजनीति की तो बात ही कुछ और है, जिस में गैरों से ज्यादा अपनों से निबटने में पसीने छूट जाते हैं.
भारत भूषण श्रीवास्तव

'मुझे तो कुछ करने ही नहीं दिया जा रहा' जैसा रोना रोने वाले एक लिहाज से देखें तो बेहद कामचोर, बहानेबाज और एक हद तक निकम्मे भी होते हैं, जो अपनी कमजोरियां दूसरे के सिर मढ़ कर जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश करते रहते हैं, लेकिन खुद अपनी तरफ से कुछ करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं. लंबे वक्त से अनदेखी का शिकार | रहे दिग्गज युवा कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भी यही हो रहा था कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ और दूसरे सीनियर धाकड़ नेता दिग्विजय सिंह उन्हें वाकई कुछ करने नहीं दे रहे थे. ऐसे में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी में जाने का फैसला ले कर जो हाहाकार न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि देशभर की राजनीति में ठीक होली के दिन मचा डाला, उस ने राजनीति का हिसाबकिताब ही गड़बड़ा दिया.

ज्यादती हो रही थी

इस में कोई शक नहीं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ ज्यादती की जा रही थी. उन्होंने कांग्रेस को साल 2018 का विधानसभा चुनाव जिताने में अहम रोल निभाया था और अपने दोस्त कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के कहने पर अपने 2 सियासी दुश्मनों कमलनाथ और दिग्विजय सिंह से पुराना बैर भी किनारे रख दिया था.

पिछले 15 साल से मजबूती से मध्य प्रदेश की सत्ता में जमी भाजपा को उखाड़ फेंकना 3 खेमों में बंटी कांग्रेस के लिए आसान काम भी नहीं था, लेकिन तीनों गुट एकजुट हो कर लड़े तो भाजपा सत्ता से बाहर हो गई.

कांग्रेस बहुमत से एक सीट कम ला पाई तो बसपा के 2, सपा के एक और 4 निर्दलीय विधायकों ने सरकार बनाने में उस का साथ दिया.

गौरतलब है कि 230 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में कांग्रेस को 114 सीटें और भाजपा को 107 सीटें मिली थीं. मतलब, पूरा बहुमत कांग्रेस को भी नहीं मिला था.

उस वक्त कांग्रेस आलाकमान ने मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी कमलनाथ को सौंपी थी. तब दलील यह दी गई थी कि कमलनाथ एक अच्छे मैनेजर हैं, उन के पास सियासत का अच्छाखासा तजरबा है और वे सब को साथ ले कर चलने की कूवत रखते हैं.

3 खेमों में बंटी कांग्रेस के हर गुट के तकरीबन 30-30 विधायक थे. ऐसे में दिग्विजय सिंह गुट का रोल अहम हो गया था, जिस ने कमलनाथ का साथ दिया और उन्हें मुख्यमंत्री बनवाने में भी अहम रोल निभाया. लेकिन बैलैंस बनाए रखने के लिए सिंधिया गुट की अनदेखी नहीं की गई थी. उन के खेमे से 7 विधायक मंत्री बनाए गए थे.

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