कोरोना मजबूरी मजदूर की

Manohar Kahaniyan|May 2020

We're offering this story for free to read so that you can stay updated on the COVID-19 outbreak
कोरोना मजबूरी मजदूर की
मजदूर शब्द सुनते ही जहन में एक तसवीर कौंधती है, धूलमिट्टी में सनी, पसीने की गमक से सराबोर और फटे हाल. कोई मजबूरी ही उसे मजदूरी की राह पर ले जाती है और समाज का सब से बेबस, कमजोर, असहाय और नगण्य नागरिक मजदूर' बना देती है.
पुष्कर पुष्प

हालांकि तमाम फिल्मों में मजदूर के लोहे जैसे मजबूत हाथों और और मजदूर संघ, मजदूर यूनियन, मजदूर मोर्चों का जिक्र आया है, लेकिन हम उस मजदूर की बात कर रहे हैं, जिस के पास हाथों के अलावा कुछ नहीं होता.

बहरहाल, जब इसी मजबूरी तले हजारों हाथ एक साथ मिलते हैं, तो चमचमाती आलीशान इमारतें वजूद में आती हैं. फैक्ट्रियों,कारखानों की रौनक का आधार भी यही दबाकुचला वर्ग होता है.

कह सकते हैं कि किसी भी समाज की प्रगति की पहली आधारशिला यही मजदूर वर्ग है, जिस की मजबूरी और परेशानी को पिछले कुछ हफ्तों के दौरान सब से ज्यादा अनदेखा किया गया है.

कोरोना अटैक के बाद जब अचानक लौकडाउन घोषित कर दिया गया तब हजारों की संख्या में मजदूर महानगरों में फंस कर रह गए. एकएक कर गुजरते दिन के साथ उन की नौकरियां खत्म होने लगी. जो ठेकेदारों के साथ काम करते थे, उन्हें नाममात्र का पैसा दे कर छोड़ दिया गया.

जैसेजैसे वक्त बीतता गया, इन लोगों का हाल बेहाल होने लगा. दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूरों के पास न पेट भरने के लिए पैसा था और न रहने के लिए कोई जगह.

राज्य सरकारों की तमाम कोशिशों के बावजूद सभी तक मदद पहुंचनी भी संभव नहीं थी. धीरेधीरे कई एनजीओ और निजी संस्थाएं मदद के लिए आगे आने लगी, लेकिन उन की मदद का भी एक निश्चित दायरा था, जबकि मजदूर वर्ग शहर के कोनेकोने में फैला हुआ था.

इस दौरान मीडिया की खबरों में कुछ ऐसे दृश्य भी देखनेसुनने को मिले, जो मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाले थे. सड़े हुए फलों के ढेर से खाने योग्य सामग्री ढूंढते हाथों को देख कर उन की मजबूरी का अनुमान लगाना भी आसान नहीं है. साथी मजदूरों के साथ खुले आसमान तले रात बिताने को मजबूर महिलाएं और लड़कियां, भूख से बिलखते बच्चे, आश्रयहीन साधनहीन और बेबस स्त्री पुरुष.

जैसेजैसे लौकडाउन का समय बढ़ता गया,वैसेवैसे उम्मीदें और हिम्मत टूटती चली गई. बाकी जरूरतों का तो कहना क्या, जब भूख और प्यास हद पार करने लगी तो मजदूरों ने अपनेअपने गांव, अपनों के बीच लौटने का फैसला कर लिया.

articleRead

You can read up to 3 premium stories before you subscribe to Magzter GOLD

Log in, if you are already a subscriber

GoldLogo

Get unlimited access to thousands of curated premium stories and 5,000+ magazines

READ THE ENTIRE ISSUE

May 2020