आम आदमी और सरकारी विश्वविद्यालय

Careers 360 - Hindi|February 2020

आम आदमी और सरकारी विश्वविद्यालय
शुल्क में बढ़ोतरी किए जाने के कारण मची उथल-पुथल वाली स्थिति की नींव कई वर्षों पूर्व ही पड़ गई थी।
अभय आनंद

शशांक कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय में बीए ( इतिहास ) अंतिम वर्ष के छात्र हैं । आर्थिक रूप से पिछड़े झारखंड के दुमका जिले के शशांक स्नातकोत्तर के लिए अत्यधिक सब्सिडी वाली सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली के भरोसे हैं । स्नातक की पढ़ाई के बाद इन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एमए इंटरनेशनल रिलेशंस में दाखिला लेने और फिर सिविल सेवाओं में जाने की योजना बना रखी है । लेकिन जेएनयू में फीस वृद्धि की आशंका सपने की राह में बाधा बनी दिख रही है ।

शशांक के पिता कपड़े की दुकान पर काम करके लगभग 10000 रुपये मासिक कमाते हैं । स्कूल में पढ़ने वाले दो अन्य बच्चे होने के बावजूद वे दिल्ली में रहकर पढ़ने के लिए हर महीने 2500 रुपये शशांक को भेजते हैं । ' तीन वर्ष पूर्व मेरे 12वीं पास होने पर मेरे पिता ने फैसला किया कि मुझे डीयू में प्रवेश लेना चाहिए क्योंकि झारखंड और बिहार में अच्छे विकल्प कम ही उपलब्ध थे ।' पहले वर्ष शशांक उत्तम नगर में रिश्तेदारों के साथ रहे और रहने के खर्च की बचत की । बाद में वे जेएनयू के करीब एक कॉलोनी में चले गए जो कि उनके कॉलेज के करीब भी है । पिता द्वारा भेजी जाने वाली राशि के पूरक के तौर पर शशांक शाम को बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हैं । उन्हें उम्मीद थी कि जेएनयू के सब्सिडी वाले छात्रावास, कम शुल्क और छात्रवृत्ति की मदद से वे अपने पिता से पैसा लेना बंद कर पाएंगे । लेकिन सितंबर के अंत में, विश्वविद्यालय ने अपने छात्रावास के शुल्क में भारी बढ़ोतरी करने का फैसला लिया । छात्रों के भारी विरोध के बाद भी इसे पूरी तरह वापस नहीं लिया गया । इस बीच, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों और फिल्म और मीडिया प्रशिक्षण संस्थानों सहित अन्य प्रमुख संस्थानों में भी फीस बढ़ा दी गई । व्यापक विरोध ने रोलबैक या पुनर्विचार के लिए कुछ को मजबूर किया है लेकिन छात्रों को चिंता है कि राहत अस्थायी होगी । शशांक और उन जैसे हजारों छात्रों की योजनाएं अब खतरे में हैं, लेकिन जैसा कि शिक्षाविद और विश्वविद्यालयों के पूर्व प्रशासकों का कहना है, फीस संकट की स्थिति वर्षों से तैयार हो रही थी ।

शुल्क वृद्धि के नाम रहा दशक

शुल्क बढ़ोतरी के संकेत पहली बार लगभग एक दशक पहले मिले थे । भारत में शिक्षा समवर्ती विषयों की सूची में है, यह संयुक्त रूप से राज्यों और केंद्र द्वारा वित्तपोषित और विनियमित है । संसाधनों की कमी से हमेशा जूझते राज्य विश्वविद्यालयों ने सबसे पहले वित्तीय संकट को महसूस किया और यहां तक कि कर्मचारियों का वेतन देने के लिए संघर्ष करना पड़ा । बेहतर वित्त पोषित, केंद्रीय संस्थानों की स्थिति थोडी बेहतर थी, लेकिन उन्हें भी कई तरह की दिक्कतों संचालन की बढ़ती लागत, मुद्रास्फीति, नए केंद्रों और कार्यक्रमों के साथ विस्तार और 2007 में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 % कोटे के परिणामस्वरूप छात्रों की संख्या में वृद्धि आदि का सामना करना पड़ा । किसी अन्य आरक्षण योजना का लाभ न पाने वाले आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग ( ईडब्ल्यूएस ) के लिए 10 प्रतिशत सीटों का कोटा लागू हो जाने से सीटों में और वृद्धि हुई ।

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