भविष्य के महानायक या 'एक असम्भव सम्भावना'?
Pratiman|January - June 2020
भविष्य के महानायक या 'एक असम्भव सम्भावना'?
गाँधी एक अर्थ में अनूठे हैं भारत के इतिहास में। भारत के विचारशील व्यक्ति ने कभी भी समाज, राजनीति और जीवन के संबंध में सीधी कोई रुचि नहीं ली है। भारत का महापुरुष सदा से पलायनवादी रहा है। उसने पीठ कर ली है समाज की तरफ़। उसने मोक्ष की खोज की है, समाधि की खोज की है, सत्य की खोज की है, लेकिन समाज और इस जीवन का भी कोई मूल्य है यह उसने कभी स्वीकार नहीं किया। गाँधी पहले हिम्मतवर आदमी थे जिन्होंने समाज की तरफ़ से मुँह नहीं मोड़ा। वह समाज के बीच खड़े रहे और जिंदगी के साथ और जिंदगी को उठाने की कोशिश उन्होंने की। यह पहला आदमी था जो जीवनविरोधी नहीं था, जिसका जीवन के प्रति स्वीकार का भाव था।
आलोक टण्डन

गाँधी के बारे में, उनके विचारों से गहरा मतभेद रखने वाले आचार्य रजनीश का उपरोक्त कथन भले ही कुछ लोगों को अतिशयोक्तिपूर्ण लगे, लेकिन भारतीय परम्परा के इतिहास में वह गाँधी के अति महत्त्वपूर्ण अवदान को दृढ़ता से स्थापित करता है। समीक्ष्य कृति के लेखक सरोज कुमार वर्मा गाँधी और रजनीश, दोनों के गम्भीर अध्येता हैं। उन्होंने और भी आगे बढ़ कर, गाँधी को भविष्य का महानायक घोषित किया है। गाँधी की डेढ़ सौवीं वर्षगाँठ मनाने के क्रम में उनके विचारों की प्रासंगिकता को लेकर जो विपुल साहित्य सामने आया है, उसमें कई तरह के बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं। यह पुस्तक उसी की एक कड़ी है। अच्छी बात यह है कि लेखक ने पुस्तक की भूमिका में प्रासंगिकता के मूल्यांकन का जो पैमाना निर्धारित किया है, वह क़ाबिले तारीफ़ है और उसे उन्होंने गाँधी के विचारों पर ईमानदारी से लागू करने का प्रयास किया है। उनके इस कथन से शायद ही कोई असहमत हो कि 'अतीत का कोई भी विचार चाहे वह अपने वक़्त के कितने भी अंतर्विरोधों को दूर करने में सक्षम रहा हो, यदि वर्तमान की जटिलताओं को सुलझा पाने में समर्थ नहीं है, तो आज के लिए प्रासंगिक नहीं हो सकता।' (पृ. 9) गाँधी-विचार इस चुनौती पर कैसे खरा उतरता है, यही समीक्ष्य पुस्तक का केंद्रीय विषय है जो किसी भी पाठक के मन में जिज्ञासा जगाने के लिए काफ़ी है। देखना यह है कि 'गाँधी को भविष्य के महानायक' के रूप में स्थापित करने में लेखक का प्रयास कहाँ तक सफल हुआ है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गाँधी के नेतृत्व की सफलता एक ऐसा तथ्य है जिससे उनके विरोधी भी असहमत नहीं होंगे, किंतु इक्कीसवीं सदी और भविष्य की शताब्दियों में उनके विचारों की प्रासंगिकता पर कई सवाल खड़े किये जाते रहे हैं। ऐसे में यह उचित ही है कि लेखक, स्वतंत्रता आंदोलन में गाँधी की सफलता की चर्चा से हटकर अपना ध्यान उनके विचारों की बीज पुस्तक हिंद स्वराज पर केंद्रित करे और यह देखने का प्रयास करे कि इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों के संदर्भ में इस कृति का क्या महत्त्व हो सकता है। यह अच्छी बात है कि लेखक ने यही दृष्टिकोण अपनाया है जिससे वे बहुतेरी अनावश्यक चर्चा से बच गये हैं। योजना के अनुरूप पुस्तक दो खण्डों में बँटी है। पहले खण्ड के चार आलेखों में गाँधी के विचारों की आधुनिक सभ्यता, भूमण्डलीकरण, पर्यावरण-संकट और मानवाधिकारों के प्रसंग में विवेचना की गयी है। निश्चित रूप से यह विवेचना अधूरी ही रह जाती यदि गाँधी के विचारों की तुलना हम प्राचीन/अर्वाचीन भारतीय विचारकों के साथ न करते । इसलिए पुस्तक के दूसरे तुलनात्मक खण्ड में लेखक ने गाँधी के विचारों की तुलना क्रमशः महावीर, विवेकानंद, रवींद्रनाथ और श्री अरविंद के विचारों से करने का प्रयास किया है। अलग-अलग समय पर लिखे गये इन लेखों में कहीं-कहीं दुहराव स्वाभाविक है किंतु लेखक की कार्य-योजना एकदम स्पष्ट है और इसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं।

हिंद स्वराज गाँधी-दृष्टि की बीज-पुस्तक है जिसमें उनके केंद्रीय विचार संकलित हैं। ऐसा अधिकतर विह का मानना है क्योंकि प्रकाशन के 35 वर्ष बाद भी गाँधी ने उसमें कोई परिवर्तन करने से इंकार कर दिया था। इसीलिए लेखक ने अपनी पुस्तक का प्रथम और सबसे बड़ा लेख हिंद स्वराज के सभ्यता-दर्शन पर केंद्रित किया है। हिंद स्वराज लिखे जाने के ऐतिहासिक संदर्भ से हम सभी परिचित हैं कि यह भारतीय स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए हिंसक विचारधारा के जवाब के रूप में लिखी गयी थी, किंतु कम ही लोगों को यह ज्ञात होगा कि गाँधी ने इसे अपने मित्र डॉ. प्राणलाल मेहता के लिए लिखा था, जिनके साथ वे एक महीना रहे थे। सम्भवतः इसीलिए, लेखक के मतानुसार, इसे पाठक-सम्पादक-संवाद के रूप में लिखा गया है। लेकिन एक ऐसी पुस्तक जिसे गाँधी के राजनीतिक गुरु गोखले ने विचारों में कच्चा और अनगढ़ कह कर निरस्त कर दिया था। लेकिन, ऐसी क्या ख़ास बात है कि वह आज भी चर्चा का विषय बनी हुई है ? गाँधी की माने तो 'यह द्वेषधर्म की जगह प्रेमधर्म सिखाती है, हिंसा की जगह आत्म बलिदान को रखती है, पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है।' (पृ. 17) किंतु यह बात अधूरी है। वास्तव में, हिंद स्वराज की जनप्रिय-सफलता के पीछे, जैसा कि लेखक ने भी माना है, आधुनिक सभ्यता की सख्त आलोचना है जिसके मूल में गाँधी का सभ्यता-संबंधी चिंतन है। हिंद स्वराज पर पिछले एक दशक में जो विपुल साहित्य सामने आया है, उससे सुविज्ञ पाठक परिचित हैं, लेखक ने उसे अपनी सहज-सरल भाषा में प्रस्तुत करके सामान्य जन के लिए और सुगम बना दिया है। देखना यह होगा कि क्या वे गाँधी के तर्क को आज की चुनौतियों के सामने अधिक प्रासंगिक बना सके हैं ?

गाँधी से पहले और बाद में, आधुनिक पश्चिमी सभ्यता की आलोचना करने वाले अनेक विचारक रहे हैं। सवाल उठता है कि गाँधी की आलोचना और उनके समाधान इन विचारकों की आलोचना से किस तरह भिन्न है ? निश्चय ही गाँधी के पास हज़ारों साल पुरानी सभ्यता का संस्कार और औपनिवेशिक दासता का अनुभव है जो औरों के पास नहीं है। ध्यातव्य है कि गाँधी आधुनिक पश्चिमी सभ्यता, जिसे वे 'शैतानी सभ्यता' मानते हैं, की आलोचना एक विशिष्ट नैतिक दृष्टिकोण के आधार पर करते हैं जिसकी जड़ें उनके 'सभ्यता दर्शन' में हैं। उनके अनुसार, 'सभ्यता वह आचरण है जिसमें आदमी अपना फ़र्ज़ अदा करता है। फ़र्ज़ अदा करने का मानी है नीति का पालन करना। नीति के पालन का मतलब है मन और इंद्रियों को बस में रखना। ऐसा करते हुए हम अपने को पहचानते हैं। यही सभ्यता है।' (पृ. 30) इनके विपरीत, आधुनिक सभ्यता की पहचान यह है कि लोग बाहरी (दुनिया) की खोजों में और शरीर के सुख में धन्यता और पुरुषार्थ मानते हैं।' (पृ. 18)। गाँधी की बात को बल प्रदान करने के लिए लेखक ने पश्चिम के दार्शनिकों, जैसे एरिस्टीपस, एपिक्यूरस, बेंथम, मिल, स्पेंसर आदि के सुखवादी सिद्धांतों को पश्चिमी सभ्यता का आधार प्रदान करने वाला बताया है। ऐसे में कई तरह के सवाल मन में उठते हैं। क्या गाँधी के सभ्यता-दर्शन के अनुरूप कोई सभ्यता भारत में कभी ऐतिहासिक रूप से यथार्थतः रही है या फिर यह गाँधी की अपनी आदर्श अवधारणा मात्र है ? यदि यह भारतीय सभ्यता का आदर्श मान भी लिया जाए तो इसकी तुलना पश्चिम के आदर्श से की जानी चाहिए, न कि उनके यथार्थ से, जबकि गाँधी ने स्वयं स्वीकार किया है कि उनके आदर्श की तुलना में भारतीय यथार्थ भी खरा नहीं उतरता। यदि नैतिकता के प्राचीन दृष्टिकोणों की तुलना की जाए तो हम पश्चिमी सभ्यता के सर्वकालिक महत्त्वपूर्ण दार्शनिकोंसुकरात, अरस्तू और प्लेटो आदि विचारकों को कैसे छोड़ सकते हैं जिनका नैतिक दृष्टिकोण सुखवादी तो नहीं कहा जा सकता। क्या यह विसंगति उस हीनता का परिणाम तो नहीं जिससे हमारा पूर्व-औपनिवेशिक समाज ग्रस्त रहता था और अपने को औपनिवेशिक आक्रांताओं से श्रेष्ठ सिद्ध करने के चक्कर में अपने काल्पनिक श्रेष्ठ अतीत की तुलना पश्चिम के निकृष्ट यथार्थ से करने में अपने को धन्य समझता था। हमें आदर्श की आदर्श से और यथार्थ की यथार्थ से तुलना करनी चाहिए। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अद्वैत वेदांत भारत का सिरमौर दार्शनिक सिद्धांत भले ही हो, सामान्य जन-जीवन को नैतिकता सिखाने में ऐतिहासिक दृष्टि से, अपनी पलायनवादी मोक्ष-कामना के कारण, अक्षम ही साबित हुआ है।

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