हिंसक आर्थिकी का प्रतिरोध
Pratiman|July - December 2019
हिंसक आर्थिकी का प्रतिरोध
मशीन को उसके उचित स्थान पर बैठाना
नंदकिशोर आचार्य

गाँधी की मान्यता थी, 'सच्चा अर्थशास्त्र कभी उच्चतम नैतिक मानकों का विरोधी नहीं होता, ठीक उसी प्रकार जैसे कि सच्चा नीतिशास्त्र वही माना जा सकता है जो नीतिशास्त्र होने के साथ-साथ अच्छा अर्थशास्त्र भी हो। वह अर्थशास्त्र झूठा और निराशाजनक है जो कुबेर की पूजा को प्रश्रय देता हो और शक्तिशाली लोगों को दुर्बल लोगों की क़ीमत पर धन का संचय करने में मदद करता हो। वह तो मौत का पैग़ाम है। इसके विपरीत, सच्चा अर्थशास्त्र सामाजिक न्याय सुनिश्चित करता है, दुर्बलतम व्यक्तियों सहित सब की भलाई को बढ़ावा देता है और ढंग की जिंदगी जीने के लिए अपरिहार्य होता है।

सभ्यता को मूलतः एक नैतिक प्रक्रिया मानने के कारण जीवन के सभी पहलुओं और कार्य- व्यापारों की प्रेरणा और कसौटी में नैतिक बोध को केंद्रीय महत्त्व देना गाँधी के लिए स्वाभाविक ही था। आधुनिक अर्थशास्त्र मनुष्य को मूलतः उपभोग करने वाला प्राणी मान कर चलता है और इसलिए आश्चर्यजनक नहीं लगता कि इस धारणा पर आधारित अर्थव्यवस्था से उपजने वाली सभ्यता में अच्छे जीवन-स्तर का मतलब उपभोक्ता-सुविधाओं में उत्तरोत्तर वृद्धि है। लेकिन, गाँधी के लिए 'सभ्यता, वास्तविक अर्थों में, आवश्यकताओं के बहुलीकरण में निहित नहीं है, बल्कि उन में सोच-समझ कर स्वैच्छिक रूप से कमी करने में है।'2 गाँधी की दृष्टि में मनुष्य मूलतः उपभोक्ता नहीं बल्कि एक

नैतिक अस्तित्व है। यह सही है कि जीवन जीने के लिए कुछ साधनों की आवश्यकता होती है। इस अर्थ में वह उपभोक्ता भी है। लेकिन, गाँधी के अनुसार, उपभोग में भी उसे नैतिक मूल्यों का निर्वहन करना चाहिए। उसका उपभोग भी, अंततः उसके नैतिक विकास की प्रक्रिया का ही अंगभूत होना चाहिए। इसीलिए, गाँधी उपभोक्ता को भी सत्याग्रही बनने का आमंत्रण देते हुए कहते हैं कि शोषित श्रम द्वारा तैयार की गयी वस्तुओं को ख़रीदना और उनका इस्तेमाल करना पापयुक्त है। शोषित श्रम से उत्पादित वस्तुओं का बहिष्करण भी शोषण के ख़िलाफ़ एक प्रकार का सत्याग्रह है। इसी तरह जब वे उपभोक्ता को आवश्यकताओं के बहुलीकरण के प्रति जागरूक करते हैं तो एक ओर, उपभोक्ता को नैतिक विकास के लिए प्रेरित करते हैं क्योंकि यदि मनुष्य एक नैतिक प्राणी है तो अनावश्यक उपभोग से बचना उसके लिए ज़रूरी है, तो दूसरी ओर, अनावश्यक उपयोग के लिए अनावश्यक उत्पादन के कारण हो रही प्राकृतिक संसाधनों की हिंसक बरबादी को भी नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं। उत्पादन में अनावश्यक वृद्धि ही आर्थिक संस्थाओं और राष्ट्रों के बीच आर्थिक होड़ और उससे प्रेरित क्रूर नैतिक और सैनिक कार्रवाइयों को जन्म देती है।

आधुनिक अर्थशास्त्र उपभोग-वृद्धि को एक जीवन-मूल्य के रूप में स्थापित करता है अर्थात् उपभोग ही सभ्यता का प्रमाण हो जाता है और अत्यधिक सभ्य होने के लिए यह ज़रूरी हो जाता है कि हम अपनी आवश्यकता बढ़ाते चलें। अर्थशास्त्र को माँग और आपूर्ति का शास्त्र माना जाता है, लेकिन 'विकास' के लिए जरूरी हो जाता है कि कृत्रिम माँगों की सृष्टि की जाए क्योंकि उसके बिना आर्थिक विकास की प्रक्रिया के रुक जाने का ख़तरा पैदा हो जाता है। जिसका तात्पर्य है सम्पूर्ण आधुनिक अर्थ-व्यवस्था का ढह जाना। 'माँग' और 'आपूर्ति' के सिद्धांतकार अल्फ्रेड मार्शल को भी यह मानना पड़ा था कि 'आर्थिक संगठन का उद्देश्य जरूरतों की पूर्ति करना ही नहीं, नयी ज़रूरतों की सृष्टि करना भी है।' मार्शल के ही शब्दों में, 'यद्यपि अपने विकास के प्रारम्भिक चरण में मनुष्य की ज़रूरतें ही उसे क्रियाशील करती हैं, किंतु अनंतर हर नया क़दम नयी ज़रूरतों के लिए नयी क्रियाशीलता के बजाय ऐसी क्रियाशीलता के रूप में सामने आता है जो नयी ज़रूरतों को पैदा करती है।' इसी प्रक्रिया ने सामाजिक-राजनीतिक हिंसा तो पैदा की ही, साथ ही पारिस्थितिकी और पर्यावरण की समस्याएँ भी उसी का परिणाम है। दुनिया भर के अर्थशास्त्री-समाजशास्त्री और नीति-नियंता आज जिन दो समस्याओं को लेकर सर्वाधिक चिंतित हैं, वे हैं रोज़गारविहीन विकास तथा पारिस्थितिकीय असंतुलन। उनका कोई स्थायी समाधान उन्हें नहीं सूझ रहा है।

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