कुछ कहें, कुछ करें
Pratiman|July - December 2019
कुछ कहें, कुछ करें
सामुदायिक मीडिया और सामाजिक परिवर्तन
फ़ैज़ उल्लाह

आधुनिक लोकतांत्रिक समाज के आकार और उसकी लगातार बढ़ती जटिलता के लिए एक मज़बूत, सुलभ और स्वतंत्र मीडिया बेहद ज़रूरी है। यह उस सार्वजनिक दायरे का प्रमुख हिस्सा है जहाँ आमजन लोक-मुद्दों के बारे में अपने विचार साझा करते हैं, बहस-मुबाहिसा करते है, और आम राय बनाते हैं। हालाँकि संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी के लिए आज बाधाओं की संख्या में थोड़ी कमी आयी हैं, पर राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण नागरिक के तौर पर व्यक्ति अभी भी सम्भावना के दायरे में ही सीमित है। इसका एक बड़ा कारण है मीडिया संस्थानों और उनकी प्रक्रियाओं में आधारभूत भेदभाव, जिसके चलते कमज़ोर समुदाय और उनकी आवाज़ को इरादतन दरकिनार कर दिया जाता है। मुख्यधारा का मीडिया- मोटे तौर पर निजी कम्पनियाँ और सरकारी स्वामित्व वाले दूरदर्शन और आकाशवाणी- आर्थिक मुनाफ़े और राजनीतिक ताक़त की ताल भरते हैं। उनमें जनजीवन से जुड़े मुद्दों के लिए बहुत कम जगह है। वैकल्पिक मीडिया, जो आमतौर पर नागरिक समूहों द्वारा संचालित है, कुछ संदर्भो में प्रभावशाली साबित हुआ है पर अकसर अपनी अलोकतांत्रिक कार्यपद्धति के कारण वह असुविधाजनक सवालों से भी घिरा रहा है। उसका यह पहलू ख़ास तौर पर लोगों की भागीदारी के संदर्भ में ज़्यादा उजागर होता है। इस लेख का लक्ष्य यह है कि इस विषय में लोगों की आवाज़ को बुलंद करने और उन्हें राजनीतिक रूप से सक्षम बनाने में सामुदायिक मीडिया की क्या भूमिका हो सकती है? यह लेख दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और मुम्बई में सामुदायिक मीडिया के साथ मेरे पिछले चार वर्षों के काम और सीखने-सिखाने के अनुभवों पर आधारित है। इस लेख में प्रौद्योगिकी के लोकतंत्रीकरण पर भी प्रकाश डाला गया है।

यूँ तो 'एक व्यक्ति, एक वोट' का संवैधानिक अधिकार हम सबको राजनीतिक प्रक्रियाओं में भाग लेने की एक समान आज़ादी देता है पर हाशिये पर बसी एक बड़ी संख्या के लिए यह आज़ादी आज भी बेमतलब है। एक बेहतर समाज में गरिमापूर्ण जीवन की तमाम आकांक्षाएँ केवल उनके एक वोट में सिमट कर रह गयी हैं। हैदराबाद सेंट्रल युनिवर्सिटी के दिवंगत दलित छात्र रोहित वेमुला' ने इस अनुभव को अपने आख़िरी ख़त में बहुत मार्मिकता से रेखांकित किया है : 'एक आदमी की क़ीमत उसकी तात्कालिक पहचान और नज़दीकी सम्भावना तक सीमित कर दी गयी है। एक वोट तक। आदमी एक आँकड़ा बन कर रह गया है। एक वस्तु मात्र। कभी भी आदमी को उसके दिमाग़ से नहीं आंका गया। एक ऐसी चीज़ जो स्टारडस्ट से बनी थी। हर क्षेत्र में, अध्ययन में, गलियों में, राजनीति में, मरने में और जीने में'।

articleRead

You can read up to 3 premium stories before you subscribe to Magzter GOLD

Log in, if you are already a subscriber

GoldLogo

Get unlimited access to thousands of curated premium stories, newspapers and 5,000+ magazines

READ THE ENTIRE ISSUE

July - December 2019