मोहन की सूझबूझ
Champak - Hindi|September First 2020
मोहन की सूझबूझ
"बेटा मोहन, कल सुबह तुम जरा जल्दी उठ जाना. तुम भी मेरे साथ खेत में चलोगे, 10 साल के मोहन से उसके पिता ने कहा.
इंद्रजीत कौशिक

"जरूर चलूंगा पिताजी, वैसे भी कई दिनों से मुझे अपना खेत देखने की इच्छा हो रही थी," मोहन ने खुश होते हुए उत्तर दिया.

मोहन 5वीं कक्षा में पढ़ता था. कोरोना वायरस के कारण महीनों तक वह घर पर रहा, लेकिन अब वह मुश्किल से अपने गांव आ पाया था. गांव का माहौल शहर के माहौल से बिलकुल अलग था. इसलिए खेत पर जाने की बात सुन कर मोहन की बांछे खिल गईं.

अगले दिन पिताजी उसे सुबहसुबह अपने साथ खेत पर ले गए. एक तो तेज गरमी और ऊपर से कड़ी धूप. ऐसे में मोहन एक बार तो घबरा सा गया.

"बेटा, मैं तुम्हें यहां खेत पर काम करवाने के लिए नहीं लाया बल्कि यह बताने के लिए लाया हूं कि खेतीबाड़ी का काम कितना कठिन होता है. मौसम चाहे कैसा भी हो, किसान कठिन परिस्थिति में काम कर के हम लोगों के लिए अन्न पैदा करता है," पिताजी बोले.

“आप ने बिलकुल सही कहा पिताजी, पर मैं यहां बैठना नहीं चाहता, आप मुझे भी कोई काम बताइए,” मोहन बोला तो पिताजी उस की लगन से बहुत खुश हुए.

उन्होंने मोहन को खेत के बीच में पेड़ के नीचे चरने वाली 4-5 बकरियों को चारा और पानी देने के लिए कहा और फिर वे अपने काम में व्यस्त हो गए.

मोहन कुंए में पानी लेने गया और उस में से पानी निकालने के लिए बालटी डाली. लेकिन गरम पानी देख कर वह हैरान रह गया.

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