हम कागज़ नहीं दिखाएंगे

Chakmak|January - February 2020

हम कागज़ नहीं दिखाएंगे
मैं अपना नाम नहीं बताऊँगी - न तुमको, न किसी और को। मैं किसी को कागज़ नहीं दिखाऊँगी, यह सिद्ध करने के लिए कि मैं यहाँ की हूँ। यह मुल्क मेरा है।
विनता विश्वनाथन

ये शब्द शाहीन बाग मैं बैठी एक बुजुर्ग महिला के हैं। अगर तुम शाहीन बाग जाओगे तो दिन हो या रात, तुम्हें महिलाओं और उनके बच्चों की भीड़ बैठी मिलेगी। आसपास नौजवान भी खड़े मिलेंगे। वे तुमसे पूछेगे - “आपने खाना खाया? कुछ खा लीजिए।" एक छोटा मंच दिखेगा जिस पर तुम्हें कभी किसी का व्याख्यान, तो कभी कोई रैप या गाना सुनने को मिल जाएगा। दरअसल, यह भीड़ कई हफ्तो से जारी शान्तिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन है।शाहीन बाग दिल्ली का एक इलाका है जहाँ 15 दिसम्बर की रात को 10 महिलाएं अपने घर से निकलकर सड़क पर खड़ी हो गईं। वे जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी में छात्र-छात्राओं पर हुई हिंसा के खिलाफ विरोध दर्ज करना चाहती थीं। कुछ ही समय में और कई महिलाएँ उनका साथ देने लगीं। उस रात से आज तक शाहीन बाग में लगातार महिलाएँ बैठी हुई हैं - बारी-बारी से, 2 डिग्री की ठण्ड में भी, अपने बच्चों को साथ लेकर!

इसी किस्म का विरोध-प्रदर्शन देश के कई शहरों में हो रहा है।

कौन नागरिक? कौन घुसपैठिया?

ये लोग किस चीज़ का विरोध कर रहे हैं इसे समझने कि लिए पहले असम चलते हैं। कई दशकों से असमिया लोग वहाँ बसे बंगालियों से परेशान हैं। बंगाली लोग कई वजहों से असम में आकर बसते रहें हैं - कभी अपने इलाके में हिंसा से बचने के लिए, तो कभी रोज़गार की तलाश में। असमिया लोगों को ऐसा लगता है कि उनकी ज़मीन व नौकरियाँ बंगाली ले रहे हैं और उनकी भाषा और संस्कृति को भी बंगालियों से खतरा है। बंगालियों की कई पीढ़ियाँ यहाँ पैदा हुई हैं लेकिन इन सब को आज भी घुसपैठिया माना जाता है।

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