धान की बीमारी को कैसे नियंत्रित करें
Modern Kheti - Hindi|August 1, 2020
धान की बीमारी को कैसे नियंत्रित करें
धान की बीमारी को कैसे नियंत्रित करें
एमडी सरवरे आलम, सुशील एवं विकास कुमार

1. जीवाणुज पत्ती अंगमारी रोग/जीवाणुज पर्ण झुलसा रोग (Bacterial Leaf Blight): जीवाणुज पर्ण झुलसा रोग लगभग पूरे विश्व के लिए एक परेशानी है। भारत में मुख्यत यह रोग धान विकसित प्रदेशों जैसे पंजाब हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, कर्नाटका, तमिलनाडु में फैली हुई है। इसके अलावा अन्य कई प्रदेशों में भी यह रोग देखा गया है। भारत वर्ष में यह रोग सबसे गंभीर समस्या बन गया है। यह रोग बिहार में भी बड़ी तेजी से फैल रहा है। यह रोग जैन्थोमोनास ओराइजी पी.वी. ओराइजी नामक जीवाणु से होता है। मुख्य रूप से यह पत्तियों का रोग है। यह रोग कुल दो अवस्थाओं में होता है, पर्ण झुलसा अवस्था एवं क्रेसेक अवस्था। सर्वप्रथम पत्तियों के ऊपरी सिरे पर हरे पीले जलधारित धब्बों के रूप में रोग उभरता है। पत्तियों पर पीली या पुआल के रंग कबी लहरदार धारियां एक या दोनों किनारों के सिरे से शुरू होकर नीचे की ओर बढ़ती है और पत्तियां सूख जाती हैं। ये धब्बे पत्तियों के किनारे के समानान्तर धारी के रूप में बढ़ते हैं। धीरे-धीरे पूरी पत्ती पुआल के रंग में बदल जाती है। ये धारियां शिराओं से घिरी रहती हैं और पीली या नारंगी कत्थई रंग की हो जाती हैं। मोती की तरह छोटे-छोटे पीले से कहरूवा रंग के जीवाणु पदार्थ धारियों पर पाये जाते हैं, जिससे पत्तियां समय से पहले सूख जाती हैं। रोग की सबसे हानिकारक अवस्था म्लानि या क्रेसेक है जिससे पूरा पौधा सूख जाता है। रोगी पत्तियों को काट कर शीशे के ग्लास में डालने पर पानी दुधिया रंग का हो जाता है। जीवाणु झुलसा के लक्षण धान के पौधे में दो अवस्थाओं में दिखाई पड़ते हैं। म्लानी अवस्था (करेसेक) एवं पर्ण झुलसा (लीफ ब्लास्ट) जिसमें पर्ण झुलसा अधिक व्यापक है। झुलसा अवस्थाः पत्ती की सतह पर जलसिक्त क्षत बन जाते हैं और इनकी शुरूआत पत्तियों के ऊपरी सिरों से होती है। बाद में ये क्षत हल्के पीले या पुआल के रंग के हो जाते हैं और लहरदार किनारे सहित नीचे की ओर इनका प्रसार होता है। ये क्षत उत्तिक्षयी होकर बाद में तेजी से सूख जाते हैं। म्लानी या क्रेसेक अवस्था रोग की यह अवस्था दौजियां बनना आरंभ होने के दौरान नर्सरी में दिखाई पड़ती है। पीतिमा एवं अचानक म्लानी इसके सामान्य लक्षण हैं। म्लानि वस्तुत लक्षण की दूसरी अवस्था है। ये लक्षण रोपाई के 3-4 सप्ताह के अंदर प्रकट होने लगते हैं। इस अवस्था में ग्रसित पौधों की पत्तियां लंबाई के अंदर की ओर सिकुड़कर मुड़ जाती हैं जिसके फलस्वरूप पूरी पत्ती मुरझा जाती है, जो बाद में सूख कर मर जाती है। कभी-कभी क्षतस्थल पत्तियों के बीच या मध्य शिरा के साथ-साथ पाये जाते हैं। ग्रसित भाग से जीवाणु युक्त श्राव बूंदों के रूप में निकलता है। ये श्राव सूखकर कठोर हो जाते हैं और हल्के पीले से नारंगी रंग की कणिकाएं अथवा पपड़ी के रूप में दिखाई देता है।

रोग नियंत्रण

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August 1, 2020