धान की फसल: रोगों और कीटों से बचाव
Farm and Food|September First & Second 2020
धान की फसल: रोगों और कीटों से बचाव
हमारे देश में खरीफ की प्रमुख खाद्यान्न फसल धान है. इस की खेती असिंचित व सिंचित दोनों परिस्थितियों में की जाती है. धान की फसल में विभिन्न रोगों व कीटों का प्रकोप होता है. कीट व रोग प्रबंधन का कोई एक तरीका समस्या का समाधान नहीं बन सकता. इस लिए रोग व कीट प्रबंधन के उपलब्ध सभी उपायों को समेकित ढंग से अपनाया जाना चाहिए.
डा. प्रेम शंकर , डा. एसएन सिंह , डा. राकेश शर्मा * वीना सचान

प्रमुख रोग झोंका (ब्लास्ट)

यह रोग पिरीकुलेरिया ओराइजी नामक कवक द्वारा होता है. इस रोग के लक्षण सब से पहले पत्तियों पर दिखाई देते हैं, परंतु इस का हमला पर्णच्छद, पुष्पक्रम, गांठों और दानों के छिलकों पर भी होता है.

पत्तियों पर आंख की आकृति के छोटे, नीले धब्बे बनते हैं जो बीच में राख के रंग के और किनारे पर गहरे भूरे रंग के होते हैं, जो बाद में बढ़ कर आपस में मिल जाते हैं. इस वजह से पत्तियां झुलस कर सूख जाती हैं. तनों की गांठें पूरी तरह या उन का कुछ भाग काला पड़ जाता है. कल्लों की गांठों पर कवक के हमले से भूरे धब्बे बनते हैं, जिन के गांठ के चारों ओर से घेर लेने से पौध टूट जाते हैं. बालियों के निचले डंठल पर धूसर बादामी रंग के क्षतस्थल बनते हैं, जिसे 'ग्रीवा विगलन' कहते हैं. ऐसे डंठल बालियों के भार से टूट जाते हैं, क्योंकि निचला भाग ग्रीवा संक्रमण से कमजोर हो जाता है.

बचाव

• झोंका अवरोधी प्रजातियां जैसे नरेंद्र-118, नरेंद्र-97, पंत धान-6, पंत धान-11, सरजु-52, वीएल धान-81 आदि रोग रोधी किस्मों का प्रयोग करें.

• इस रोग के नियंत्रण के लिए बोआई से पूर्व बीज को ट्राईसाइक्लैजोल 2 ग्राम या थीरम और कार्बंडाजिम (2:1)की 3 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें.

• रोग के लक्षण दिखाई देने पर 10-12 दिन के अंतराल पर या बाली निकलते समय 2 बार जरूरत के अनुसार कार्बंडाजिम 50 फीसदी घुलनशील धूल की 1 किलोग्राम मात्रा को 700-800 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

• रोग का अधिक प्रकोप होने की दशा में ट्राईसाइक्लैजोल की 350 ग्राम मात्रा को 700-800 लिटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें, साथ ही स्टीकर/सरफेक्टेंट 500 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर मिलाएं.

भूरी चित्ती या भूरा धब्बा

यह रोग हेल्मिन्थोस्पोरियम ओराइजी कवक द्वारा होता है. इस रोग के कारण पत्तियों पर गोलाकार भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं. पौधों की बढ़वार कम होती है. दाने भी प्रभावित हो जाते हैं, जिस से उन की अंकुरण क्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है.

पत्तियों पर धब्बे आकार व माप में बहुत छोटे बिंदी से ले कर गोल आकार के होते हैं. पत्तियों पर ये काफी बिखरे रहते हैं. छोटा धब्बा गाढ़ा भूरा या बैगनी रंग का होता है. बड़े धब्बों के किनारे गहरे भूरे रंग के होते हैं और बीच का भाग पीलापन लिए गंदा सफेद या धूसर रंग का हो जाता है. धब्बे आपस में मिल कर बड़े हो जाते हैं और पत्तियों को सुखा देते हैं.

बचाव

• उर्वरकों खासकर नाइट्रोजन की संस्तुत मात्रा का ही प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि नाइट्रोजन की अधिक मात्रा देने से रोग का प्रकोप बढ़ जाता है.

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