लौकडाउन मे जी उठी यमुना

Farm and Food|May Second 2020

लौकडाउन मे जी उठी यमुना
करोड़ों रुपए खर्च कर के जो काम न हो पाया, वह काम महज चंद दिन के लौकडाउन ने कर दिया. दिल्ली में यमुना जी उठी है. यमुना फिर से सांसें ले रही है. फिर से नीली दिख रही है. इस में मछलियां अठखेलियां करती नजर आ रही हैं.
नसीम अंसारी कोचर

यमुना को साफ करने के लिए केंद्र और दिल्ली सरकार ने बड़ी मशक्कतें कीं, इस की सफाई के लिए करोड़ों का बजट फूंक दिया, मगर कोई सकारात्मक परिणाम कभी नहीं निकला. लेकिन लौकडाउन में यमुना ने खुद अपने को साफ कर लिया.

लौकडाउन में न तो यमुना में औद्योगिक कचरा गिरा, न लोग अपना मैल धोने यहां आए और न पूजापाठ हुई. शवदाह, अस्थि या मूर्ति विसर्जन जैसे काम भी इस के घाटों पर नहीं हुए.

नतीजा, यमुना खुश हो कर अपने अति पुराने सुंदर नीले रूप में निखर आई. यमुना के इस बदलाव को विशेषज्ञों के स्तर पर काफी गंभीरता से लिया जा रहा है. लौकडाउन ने यमुना ही नहीं, देश की बाकी नदियों को भी जीवनदान दिया है. गंगा, गोमती, ब्रह्मपुत्र जैसी तमाम नदियों का पानी अपना रंग बदल कर स्वच्छ नीला नजर आने लगा है. इन में जलीय जीवों की तादाद बढ़ती दिख रही है.

गौरतलब है कि दिल्ली में यमुना को साफ करने के लिए सरकारी योजनाएं साल 1975 से बनबिगड़ रही थीं. इन योजनाओं का आज तक कोई परिणाम नहीं निकला. इन योजनाओं पर करोड़ोंअरबों रुपए स्वाहा हो चुके हैं.

साल 2011 के मई महीने में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने दिल्ली सरकार से यमुना उद्धार की रिपोर्ट भी मांगी थी, मगर तत्कालीन सरकार कोई उत्साहवर्धक रिपोर्ट पेश नहीं कर पाई.

सरकार द्वारा दिल्ली के 22 किलोमीटर हिस्से की यमुना नदी की सफाई के लिए पिछले दशक में 2,000 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं, परंतु यमुना जस की तस गंदी बनी रही. सारा पैसा नेताओं और सरकारी अधिकरियों की जेबों में चला गया. गंदगी, गाद और औक्सीजन की भयंकर कमी ने यमुना की मछलियों का जीवन भी दुश्वार कर दिया. बीते कई सालों से यमुना में मछलियों का टोटा पड़ गया था.

यमुना को शुद्ध करने के लिए बाकायदा 'यमुना बचाओ आंदोलन' चला. इस आंदोलन में भारतीय किसान संघ ने अहम भूमिका निभाई. प्रयाग से दिल्ली तक यमुनाभक्तों ने पदयात्राएं की, जंतरमंतर पर हजारों लोगों ने एकत्रित हो कर अपना मत सरकार के सामने रखा.

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