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Shikhar Varta - August 2019Add to Favorites

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Magazine Description

In this issue

आज़ादी के बाद का यादगार साहित्य कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। साहित्य एवं समाज एक दूसरे से प्रभावित होते हैं। एक का प्रतिबिंब दूसरे में दिखाई पड़ता है। ऐसा ही संयोग स्वतंत्रता आंदोलन एवं आज़ादी के बाद के समय में हुआ। आज़ादी के समय के परिदृश्य में उस वक्Þत के बड़े लेखक की लेखनी में तत्कालीन भारत का सजीव चित्रण प्राप्त होता है। ‘‘नायक’’ ढूँढ़ती काँग्रेस! काँग्रेस के भीतर नये अध्यक्ष को लेकर संशय की स्थिति अगर ज्Þयादा समय तक बरक़रार रहती है तो भाजपा की राज्यों पर पकड़ और बढ़ती जायेगी। इस समय यह मिथ बन चुकी है या बना दी गयी है कि काँग्रेस को यदि कोई एकजुट रख सकता है तो गाँधी परिवार ही है। आज़ादी के बाद तेरह बार नेहरू-गाँधी परिवार के बाहर के नेता ने काँग्रेस अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी संभाली है। अमेरिका, रूस से क़दमताल भारत जैसा देश जब अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर पैसा खर्च करता है तो दो विचार आते हैं, और दोनों ठीक भी है। पहला- एक गÞरीब देश को फैंसी रॉकेटों पर पैसा खर्च नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे न तो राष्ट्रीय गौरव बढ़ता है और न ही आम लोगों को इससे कोई लाभ मिलता है। दूसरा यह कि इस तरह के मिशन वैज्ञानिक स्वभाव विकसित करते हैं। भरोसे की डोर पर टिकी महत्वाकांक्षा की आशा यह बजट भारतीय अर्थव्यवस्था और लोगों के पिछले व्यवहार और प्रतिक्रियाओं के आधार पर लोगों की आकांक्षाओं और आवश्यकताओं को ध्यान में रख विकास की व्यूह रचना है। इसमेंलोगों की आय और जीने को आसान बनाने के प्रयास किए गए हैं, यह लोगों को दुनिया में तीसरी चौथी अर्थव्यवस्था बनाने और उस पर गर्व करने के लिए प्रेरित करता है। हिमा दास : भारत की नई गोल्डन उड़नपरी चैंपियंस अलग होते हैं, वे भीड़ से अलग सोचते हैं और यह सोच जब रंग लाती है तो बनता है इतिहास! ऐसी ही एक चैंपियन बनकर उभरी हैं हिमा दास! वह गत वर्ष जकार्ता एशियन गेम्स से पहली बार दुनिया की नजरों में आई और उसने 15 दिनों के अंदर5 गोल्ड मैडल जीत कर देश का नाम रोशन कर बन गई हैं हर किसी की आंखों का तारा।

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